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Year: 2021

Class VI English: There will come soft rains

“There Will Come Soft Rains” –Ray Bradbury What is the organizational structure of the story? (In what format is it told-what order?) What effect does the structure of the test create on the story itself?This story follows a chronological structure….

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शब्द भावों के

“शब्द” पर्याय नहीं होते “भावों” के… हां शब्द पर्याय नहीं होते भावों के, वेदना के बिषाद के, हर्ष के उन्माद के…!! शब्द रचते हैं भाषा, लिखते हैं, हंसीं को हंसी… आल्हाद को आल्हाद….!! शब्द नदी की तरह होते है, एक…

प्यार का जन्म (कहानी)

आज से तीन दिन पहले मैं औरंगाबाद आई थी। वहाँ मेरा एक साथी रहता है – श्रेय। मैं उसी से मिलने आई थी। मुझे मेरा साथी भी मिला और मेरा प्यार भी। मैं सिर्फ दो दिन के लिए आई थी। डेढ़ दिन मेरा श्रेय मेरे साथ रहा। 19 घंटे मैंने उसके साथ बिताए। 10 घंटे मैंने उसको याद करके बिताए। वे 29 घंटे मैंने उसके साथ जिये हैं। एक-एक पल को प्यार के एक-एक जन्म की तरह जिया है।

वाच्य (व्याकरण से आंशिक)

इस प्रकार वाच्य को हम कथन के कहने का ढंग मान सकते हैं। कथन को सीधे-सीधे कहना; फिर उसी कथन को थोड़ा घुमा कर कहना; और फिर उसी कथन को अन्य पुरुष के रूप में कहना।

निपात ( व्याकरण से आंशिक )

निपातों का प्रयोग कही गई बात पर बल देने के लिए किया जाता है। व्याकरण में कही गई बात पर बल देने को ‘बलाघात’ कहा जाता है। अतः निपातों का प्रयोग बलाघात के लिए किया जाता है। ‘बलाघात’ कुछ इस प्रकार होता है, कि एक निपात आते ही संज्ञा अथवा सर्वनाम उसी की ओर झुक जाता है तथा क्रिया से उसी अर्थ में जुड़ जाता है।

विस्मयादिबोधक अव्यय ( व्याकरण से आंशिक )

१. विस्मय बोधक ( आश्चर्य भाव ) — अरे! हें! क्या! हे भगवान! २. हर्ष बोधक ( प्रसन्नता भाव ) — अहा! वाह! क्या बात है! उत्तम! सुंदर! ३. शोक बोधक ( दु:ख भाव ) — ओह! हे राम! हे भगवान! ओहो! ४. खेद बोधक ( खेद भाव ) — ओहो! अरेरेरे! ५. क्रोध बोधक ( आवेश, रौद्र अथवा क्रोध भाव ) — क्या! इतनी हिम्मत! खबरदार! चुप! मुँह संभाल के! ५. घृणा बोधक ( घृणा अथवा कुंठा भाव ) — छि:! छी-छी! थू! थू-थू! धत! हट! हुँह! ६. भय बोधक ( भय अथवा जुगुप्सा भाव ) — बाप रे! बाप रे बाप! त्राहि! त्राहि माम्! भागो! ७. आशीर्वाद बोधक ( मंगल अथवा कल्याण भाव ) — शुभम्! कल्याणम्! मंगलम्! आरोग्यम्! खुश रहो! प्रसन्न रहो! सुखी रहो! जीते रहो! चिरंजीवी रहो! ८. चेतावनी बोधक ( सुरक्षा भाव ) — होशियार! खबरदार! सावधान! बच के! जागते रहो! रुको! ९. प्रशंसा बोधक ( उत्साह भाव ) — शाबाश! बहुत अच्छे! बहुत सुंदर! अति सुंदर! अति उत्तम! वाह! क्या बात है! क्या खूब! बहुत खूब! १०. प्रार्थना बोधक ( शांति भाव ) — ओ३म्! हरिओ३म्! शिव-शिव! अलख निरंजन! शांति!-शांति!

समुच्चयबोधक अव्यय (व्याकरण से आंशिक)

‘समुच्चय’ का शाब्दिक अर्थ है — जोड़ा। समुच्चयबोधक अव्यय जोड़ा बनाने वाले शब्दों को कहते हैं। समुच्चयबोधक ‌‌‌‌‌‌‌‌भी सदा अपरिवर्तित रहते हैं। इन के स्वरूप पर‌ लिंग, वचन, कारक, काल, देश आदि के परिवर्तन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
परिभाषा — जो अव्यय पद दो शब्दों, दो उपवाक्यों ( वाक्यांशों, पदबंधों आदि) तथा दो वाक्यों को परस्पर ( आपस में ) जोड़ते हैं, उन्हें समुच्चयबोधक अव्यय कहते हैं। ( टिप्पणी — उपवाक्यों को वाक्यांश तथा पदबंध भी कहा जाता है। )
उदाहरण — १. और — मधु और सुनंदा पक्की सहेलियाँ हैं। ‌‌ २. तथा — संतरा तथा नारंगी एक ही फल के दो नाम हैं। ३. परंतु — ईश्वर एक है परंतु उसके नाम अनेक हैं। ‌‌४. अथवा — साकार अथवा निराकार परमेश्वर हम सब के भीतर वास करता है।

संबंधबोधक अव्यय (व्याकरण से आंशिक)

यह स्मरण रहना चाहिए कि प्रत्येक संबंधबोधक अव्यय से पूर्व उपयुक्त परसर्ग अवश्य लगाया जाए, अन्यथा संबंधबोधक में क्रिया विशेषण का भ्रम हो सकता है। दोनों के बीच दुविधा भी हो सकती है। जैसे — १. मंदिर के अंदर भगवान की मूर्ति है। (के अंदर– संबंधबोधक) । १. अंदर मंदिर में भगवान की मूर्ति है। (अंदर– क्रिया विशेषण) । २. बस्ती के बाहर मैदान में आओ। (के बाहर– संबंधबोधक) २. बाहर मैदान में आओ। (बाहर– क्रिया विशेषण) ।

क्रिया विशेषण (व्याकरण से आंशिक)

परिभाषा :- वे शब्द, जो क्रिया की विशेषता बताते हैं, उन्हें क्रिया विशेषण कहते हैं।
क्रिया विशेषण अविकारी पद हैं। वाक्य में लिंग, वचन, कारक, काल आदि किसी में भी परिवर्तन होने पर ये ज्यों के त्यों रहते हैं। इनमें कोई परिवर्तन नहीं होता।
क्रियाओं की विशेषता अनेक प्रकार से बताई‌ जा सकती है। अतः क्रिया विशेषण के भेद भी भिन्न-भिन्न होते हैं।

तारीफ़ तुम्हारी (कविता – साॅनेट )

दुआ यही हम करते हैं,
तारीफ़ तुम्हारा साया हो।
हर मौके-दर-मौके पर,
तारीफ़ ने तुमको पाया हो।।

व्याकरण से आंशिक ( क्रिया )

व्याकरण के नियमों के अनुसार वाक्य में जिन पदों ( शब्दों ) से कार्य के किए जाने अथवा होने का बोध हो, उन्हें क्रिया कहते हैं। वाक्य में क्रिया के साथ जुड़े अंग इस प्रकार हैं– कर्ता , कर्म।
कर्म :- वाक्य में होने वाला मुख्य कार्य, जो क्रिया को पूरा करता है, कर्म कहलाता है। कर्म केवल संज्ञा पद ही होता है। उदाहरण :- बच्चे पाठ पढ़ते हैं। वाक्य में ‘पाठ’ – पढ़ते हैं – क्रिया को पूरा करता है। अतः ‘पाठ’ कर्म है। इसी प्रकार – पक्षी दाना चुगते हैं। – दाना । मैंने दवाई खाई। – दवाई ।

विशेषण ( व्याकरण से आंशिक )

संज्ञा तथा ( अथवा ) सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्दों को ‘विशेषण’ कहते हैं। विशेषण जिस शब्द की विशेषता बताते हैं, उसे ‘विशेष्य’ कहते हैं। ( संज्ञा अथवा सर्वनाम ) ‌‌ उदाहरण — तपती गर्मी। ‌‌’तपती’ — विशेषण; ‌‌‌‌’गर्मी’ — विशेष्य ठंडा पानी। ‘ठंडा’ — विशेषण; ‘पानी’ — विशेष्य ‌‌

सर्वनाम ( व्याकरण से आंशिक )

सर्वनाम के भेद : सर्वनाम के भेद कुछ इस प्रकार गिनाए जाते हैं —
१. पुरुषवाचक सर्वनाम ( उत्तम पुरुषवाचक, मध्यम पुरुषवाचक, अन्य पुरुषवाचक ) २. निश्चयवाचक सर्वनाम ३. अनिश्चयवाचक सर्वनाम ४. संबंधवाचक सर्वनाम ५. निजवाचक सर्वनाम ६. प्रश्नवाचक सर्वनाम

एकाकी तृप्ति ( कहानी )

एक मास, दो मास…. ; मास-प्रति-मास व्यतीत होने लगे ; इस आशा में कि, अब सब ठीक हो जाएगा ; पर नहीं ; जन-साधारण का संक्रमित होना नहीं रुका, पर हाँ! इस बीच कोरोना संक्रमण को रोकने की दवा बनाने की प्रक्रिया अवश्य प्रारंभ हो गई। डाॅक्टरों तथा वैज्ञानिकों ने जी-जान लगा दी। धीरे-धीरे मामले भी कुछ कम होने लगे, तो सबके मन को ढाँढ़स बँधने लगा, कि अब संभवतः सब कुशल हो‌ जाए। चंचला तथा उसका परिवार सभी बचावों का पूरा ध्यान रखता था। अच्छी तरह मास्क लगा कर बाहर जाते। सभी वस्तुओं को कीटाणु नाशक छिड़काव से साफ़ करते। हाथों को धोते रहते या सैनेटाइज़र लगाते। वे सब बचे हुए थे तथा भगवान को धन्यवाद देते रहते थे। सब कुशलतापूर्वक चल रहा था। आठ-नौ माह बाद समाचार जगत में संभावनाएँ व्यक्त की जाने लगीं, कि कोरोना विषाणु की रोकथाम के लिए वैक्सीन आने वाली है। धीरे-धीरे संक्रमण का विस्तार भी सिमटता दिखाई देने लगा। जिस प्रकार कृष्ण जन्म से वर्षों पूर्व ही उनके अवतार लेने की भविष्यवाणी ने जनमानस को सुखी व हर्षित कर दिया था, उसी प्रकार वैक्सीन आने की संभावना मात्र से लोगों को मानो आरोग्य संजीवनी मिल गई।

संज्ञा ( व्याकरण से आंशिक )

तो इस प्रकार संज्ञा ‘नाम’ है; ‘पहचान’ है; ‘परिचय’ है । किसी भी व्यक्ति, वस्तु, प्राणी अथवा स्थान का प्रथम परिचय हमें उसके नाम से ही मिलता है। शेष परिचय बाद में होता है।

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यह प्रार्थना मुझे अत्यंत प्रिय है। मेरे स्कूल में प्रतिदिन हुआ करती थी। …. श्री…. ( सहयोग कर्ता )____ ….. मनी ….. इस लिंक के साथ प्रस्तुत छवि हमें किसी प्रियजन द्वारा भेजी गई है।

समास (व्याकरण से आंशिक)

समास — का शाब्दिक अर्थ है — छोटा करना या संक्षिप्त करना। एक बड़े शब्द-समूह को संक्षिप्त करने की प्रक्रिया को समास कहते हैं। सामासित करके अर्थात् , संक्षिप्त करके बनाए ग‌ए एक शब्द को समस्त पद कहते हैं। जैसे — घोड़ों से चलने वाली गाड़ी — घोड़ागाड़ी। एक पद बनाने की इस प्रक्रिया को ‘समास’ के नाम से भी जाना जाता है।

विसर्ग संधि (व्याकरण से आंशिक)

विसर्ग का ‘ओ’ बन जाना — यदि विसर्ग ‘अ’ के साथ हो, तथा ‘+’ चिह्न के बाद किसी वर्ग का तीसरा या चौथा वर्ण‌ हो अथवा ‘य’ , ‘र’ ,‌‌‌‌‌‌ ‘ल’ , ‘व’ , ‘ह’ आदि में से कोई हो, तो न‌ए शब्द में विसर्ग के स्थान पर ‘ओ’ की मात्रा लग जाती है। जैसे — मन: + हर = मनोहर। वय: + वृद्ध = वयोवृद्ध। अध: + गति = अधोगति।