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निपात ( व्याकरण से आंशिक )

निपात ( व्याकरण से आंशिक )

प्रिय विद्यार्थियो!

अव्यय पदों की कड़ी में सबसे अंत में ‘निपात‘ आते हैं। अतः आज हम उन्हीं की चर्चा करेंगे।

निपात’ वे अव्यय हैं, जो अपनी उपस्थिति भर से वाक्य के अर्थ अथवा भाव में परिवर्तन उत्पन्न कर देते हैं। उदाहरण के लिए, एक वाक्य को देखिए : ” मैं जाऊँगा।”

अब उपर्युक्त वाक्य के ही परिवर्तित रूप देखिए : ‌‌ १. मैं भी जाऊँगा। २. मैं ही जाऊँगा। ३. मैं तो जाऊँगा। ४. मैं तक जाऊँगा। ५. मैं अवश्य जाऊँगा। ६. मैं सचमुच जाऊँगा। ७. केवल मैं जाऊँगा। ८. मैं केवल जाऊँगा। ९. मात्र मैं जाऊँगा। १०. मैं मात्र जाऊँगा। ११. मैं जाऊँगा तो। १२. मैं जाऊँगा अवश्य। १३. मैं जाऊँगा ही। १४. मैं बिलकुल जाऊँगा। १५. मैं नहीं जाऊँगा। १६. मैं जाऊँगा भर।

आपने देखा कि वाक्य एक ही है। केवल भिन्न-भिन्न निपातों के प्रयोग भर से वाक्य का अर्थ बदल गया है।

कुछ प्रमुख निपात इस प्रकार हैं : ‌‌

ही, भी, तो, ‌‌ तक, सचमुच, अवश्य, केवल, मात्र, बिलकुल, ‌‌नहीं, भर आदि।

निपातों का प्रयोग कही गई बात पर बल देने के लिए किया जाता है। व्याकरण में कही गई बात पर बल देने को ‘बलाघात’ कहा जाता है। अतः निपातों का प्रयोग बलाघात के लिए किया जाता है। ‘बलाघात’ कुछ इस प्रकार होता है, कि एक निपात आते ही संज्ञा अथवा सर्वनाम उसी की ओर झुक जाता है तथा क्रिया से उसी अर्थ में जुड़ जाता है।

व्याकरण में निपात अत्यंत आवश्यक हैं। हिंदी ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌भा‍षा में ‘बलाघात’ एवं ‘अनुतान’ का विशेष महत्त्व है। ‘बलाघात’ का अर्थ है- बल देकर सिद्ध करना। साधारण से वाक्य को एक छोटे से निपात से बल देकर पूरे वाक्य का स्वरूप, भाव, यहाँ तक कि कहने वाले व्यक्ति की विचारधारा तक मोड़ी जा सकती है। ‘बलाघात’ व ‘अनुतान’ परस्पर संयोजित हैं। अर्थात् एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। ‘अनुतान’ का अर्थ है- उतार-चढ़ाव। स्वर-तंत्रियों में उच्च बल उत्पन्न करते हुए कथन को ऊँचे स्वर में कहना तथा निम्न बल‌ देते हुए नीचे स्वर में कहने से वाणी में उतार-चढ़ाव अर्थात् अनुतान उत्पन्न होते हैं।

हिंदी साहित्य में; या यों कहें कि संपूर्ण वांग्मय में लेखन विधाओं यथा- कहानी, नाटक, एकांकी, उपन्यास,‌‌ रेखाचित्र, संस्मरण, आलोचना, रिपोर्ताज, यात्रा-वृतांत, आत्मकथा, जीवनी, काव्य- आदि-आदि; सबमें बलाघात तथा अनुतान से ही‌ कथा का भाव एवं रसानंद की सृष्टि ‌‌‌‌‌‌होती है। हमारे समस्त चलचित्र जगत अर्थात् हमारी सभी‌ फ़िल्मों, धारावाहिकों, विज्ञापनों; यहाँ तक कि आधुनिक समाचार वाचन शैली ‌‌‌‌‌में भी बलाघात एवं अनुतान के प्रभाव से आकर्षण उत्पन्न कर दिया जाता है। दैनिक बोलचाल में तो हम‌ जाने-अनजाने कितनी बार इसका प्रयोग करते हैं और हमें अनुभव भी नहीं होता।‌‌ यही कारण है‌, कि अंग्रेज़ी भाषा की फ़िल्में या धारावाहिक कितने‌ भी हम देख लें, सभी भाव सपाट हो जाते हैं तथा कुछ समय‌ पश्चात् केवल उनकी स्मृतियाँ भर शेष रह जाती हैं। वहीं दूसरी ओर हिंदी फ़िल्में ( चलचित्र ), धारावाहिक आदि सालों-साल ताज़ा बने रहते है और यह आकर्षण ‘निपात’ के प्रयोग से उत्पन्न ‌‌‌‌‌‌‌‌हो पाता है।

इस प्रकार ‘निपात’ न केवल व्याकरण का अपितु भाषा का अत्यंत महत्त्वपूर्ण अंग हैं।

निपातों में बस यहीं तक। विद्यार्थी अधिक जानकारी हेतु कृपया उत्तम गुणवत्ता की‌ व्याकरण पुस्तकों से पाठ देखें।

….. श्री …..

इस अंक में ली गई छवि को हमने ‘पिक्साबे’ साइट से साभार उद्धरित किया है।

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