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‘रावण का दहन और मेरे अंदर चल रहे विचाकों का द-हन’

‘रावण का दहन और मेरे अंदर चल रहे विचाकों का द-हन’ बहुत दिन से दशहरा महोत्सव के बारे में लिखने का कोशिश कर रही थी| एक साल से, शायद आज भी नहीं बैठेती मगर फिर सोचा कही ये साल भी…

सती म‌इया (स्मृति आधारित सत्य कथा)

इस देश में कन्या – शिक्षा एवं आत्मनिर्भरता न होने का इससे दु:खद परिणाम और क्या हो सकता था ? पर यह म‌इया तो आत्मनिर्भर थीं ; घी और स्वेटर बना कर बेचतीं थीं ? तब संभवतः घोर युवावस्था तथा लज्जा संरक्षण का प्रश्न होगा ! जो भी हो ; उस स्त्री को भूखा-प्यासा, उसके हाल पर, विचार करने के लिए छोड़ दिया गया। अंततः चारों ओर शून्यता और निरीहता का अनुमान कर उस निरीह तथा विवश स्त्री ने पति की राह चुन ली। स्त्रियों द्वारा समस्त पुरुष परिवार को संदेश भिजवा दिया कि पति के साथ एक चिता उसकी भी सजाई जाए। किसी को कोई आपत्ति न थी। अतः चिता तैयार हो गई। जीवित स्त्री पति की देह के साथ श्मशान घाट न जा सकी होगी, अतः ग्राम के अहाते में ही एक समतल रिक्त भूखंड पर चिता सज गई। उस चिता पर वह संपूर्ण विवाह शृंगार कर, विवाह की साड़ी पहन तथा समस्त आभूषण धारण कर ; खुले केश कर बैठ गई। साथ ही उसने एक घड़ा घी भी अपने साथ ले लिया। वह घी, जो उसने स्वयं तैयार किया था। उसने कहा, कि जब आग पकड़ेगी, तब उस। घी को वह अपने ऊपर उड़ेल लेगी या आग की गर्मी से घी स्वयं खौल कर चारों ओर फैल जाएगा। दोनों स्थितियों में वह आसानी से जल जाएगी।

अजातशत्रु (इतिहास के पन्नों से एक चरित्र)

कहते हैं कि अजातशत्रु का वास्तविक नाम क्या था, यह तो कोई नहीं जानता, परंतु अजातशत्रु का पराक्रम ही इतना था कि उससे शत्रुता मोल लेने के भय से सभी काँपते थे। कोई भी उसका शत्रु बनकर उसके सामने आना ही नहीं चाहता था। इसी कारण उसका नाम ‘अजातशत्रु’ पड़ गया।

(ऊँ श्री गणेशाय नमः) वापसी (कहानी) (ऊँ श्री भगवते वासुदेवाय नमः) (ऊँ नमः शिवाय)

इस बार मैं सचमुच लौटी थी ; सारी आशाओं को मिटाकर लौटी थी ; सारे संबंध तोड़ने का निर्णय लेकर लौटी थी। उसने प्रथम भेंट में मुझे आदर और प्रेम के दो उपहार दिए थे। लौटने के बाद सबसे प्रथम कार्य, जैसे ही मुझे अवकाश मिला, उसके उपहार लौटाना था। मैंने डाक विभाग की त्वरित डाक प्रेषण सेवा से उसे उसके उपहार भेज दिए। उसके बाद….. कुछ नहीं ! मेरे जीवन में ऐसा कुछ सम्मिलित ही नहीं हुआ था, जो मैं उसे वापस करती। एक अनजानी सी इच्छा मन में रह-रहकर ज़ोर मारती रहती थी, कि शायद….! शायद वह मुझे कभी याद ही कर ले ! मुझे कभी कोई संदेश भेज दे ! कभी मुझे फोन ही कर ले ! किंतु वैसा कभी नहीं हुआ । उसकी ओर से नीरव शांति ; या यों कहें ; नीरव विश्रांति छा गई। यही विश्रांति आज तक अनवरत है। मैंने अपनी ओर से संपर्क बनाए रखने के प्रयास किए, परंतु मेरे प्रयास विफल हुए । श्रेय ने मेरे किसी संदेश का उत्तर नहीं दिया ; कभी नहीं दिया ; नहीं दिया, तो नहीं दिया ; उसने तो मेरे कितने संदेश देखे , कितने नहीं ; मैं यह भी नहीं जानती। मैं इन प्रतिक्रियाओं से विशेष विचलित नहीं हुई, क्योंकि मेरा वश मात्र मुझ पर है, अन्य पर नहीं।

(ऊँ श्री गणेशाय नमः ) सोने का घंटा (कहानी)

वह विशिष्ट भक्त अब भी निर्बाध आता था व लगभग सभी देवी-यात्राओं में भी रहता था। शनै:-शनै: देवी कुछ उदासीन सी प्रतीत होने लगी। देवी को उसके प्रेम तथा भक्तिभाव में छलावा अनुभूत होने लगा। अब वह भक्त देवी के दर्शनों से थोड़ा वंचित होने लगा। देवी जब उसका आह्वान करती, तो वह कारण व विवशता बता कर मंदिर न आता। जो स्वर्ण उसने देवी को अर्पित करने को एकत्र किया, अपने बंधु के साथ छल से स्वयं एक भाग रख लिया। देवी से अधिकाधिक स्वर्ण एवं धन प्राप्त करने के अनुष्ठान करने लगा। तब भी देवी स्वयं अति साधारण रह कर उसकी कामना पूर्ति करती रही। एक वर्ष और व्यतीत हो गया। अब जब उस भक्त ने देखा, कि देवी उस पर कृपा नहीं कर रही, तब उसने अनेक कठिन अनुष्ठान किए। देवी ने अब कृपा करना बहुत कम कर दिया था। अब देवी उसके मोह-जाल से मुक्त होने लगी थी। उसके लिए मंदिर के कपाट बंद रहने लगे थे। तत्पश्चात् भी यदा-कदा दर्शन-यात्रा अथवा शृंखला-यात्रा के समय वह देवी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त कर लेता। देवी और साधारण हो गई ।

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Curriculum with holistic approach

What are the examples of curriculum with holistic approach? How it helps ? A curriculum with a holistic approach is designed to address the needs of the whole person, including their cognitive, emotional, social, and physical development. Here are some…

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Emotional outbursts

Why few people burst emotionally very frequently ? There are several reasons why some people may burst emotionally very frequently: Psychological issues: Individuals who experience frequent emotional outbursts may be dealing with underlying psychological issues such as anxiety, depression, bipolar…

Demerits of children thinking a lot about money

What are the demerits of children thinking a lot about money ? Thinking too much about money can have several negative impacts on children: It is important to teach children about the value of money and help them understand how…

Objections parents may have for online exams

list of objections parents may have for online examination.

Class VIII English: From Storytelling to Film-Making

Answer these questions. 1. How did mankind’s tryst with storytelling begin? 2. What do you understand by ‘hieroglyphic language’? 3. How was photography a major step up in the tradition of storytelling? 4. What is the most popular form of…

प्यार का जन्म (कहानी)

आज से तीन दिन पहले मैं औरंगाबाद आई थी। वहाँ मेरा एक साथी रहता है – श्रेय। मैं उसी से मिलने आई थी। मुझे मेरा साथी भी मिला और मेरा प्यार भी। मैं सिर्फ दो दिन के लिए आई थी। डेढ़ दिन मेरा श्रेय मेरे साथ रहा। 19 घंटे मैंने उसके साथ बिताए। 10 घंटे मैंने उसको याद करके बिताए। वे 29 घंटे मैंने उसके साथ जिये हैं। एक-एक पल को प्यार के एक-एक जन्म की तरह जिया है।

वाच्य (व्याकरण से आंशिक)

इस प्रकार वाच्य को हम कथन के कहने का ढंग मान सकते हैं। कथन को सीधे-सीधे कहना; फिर उसी कथन को थोड़ा घुमा कर कहना; और फिर उसी कथन को अन्य पुरुष के रूप में कहना।

निपात ( व्याकरण से आंशिक )

निपातों का प्रयोग कही गई बात पर बल देने के लिए किया जाता है। व्याकरण में कही गई बात पर बल देने को ‘बलाघात’ कहा जाता है। अतः निपातों का प्रयोग बलाघात के लिए किया जाता है। ‘बलाघात’ कुछ इस प्रकार होता है, कि एक निपात आते ही संज्ञा अथवा सर्वनाम उसी की ओर झुक जाता है तथा क्रिया से उसी अर्थ में जुड़ जाता है।

विस्मयादिबोधक अव्यय ( व्याकरण से आंशिक )

१. विस्मय बोधक ( आश्चर्य भाव ) — अरे! हें! क्या! हे भगवान! २. हर्ष बोधक ( प्रसन्नता भाव ) — अहा! वाह! क्या बात है! उत्तम! सुंदर! ३. शोक बोधक ( दु:ख भाव ) — ओह! हे राम! हे भगवान! ओहो! ४. खेद बोधक ( खेद भाव ) — ओहो! अरेरेरे! ५. क्रोध बोधक ( आवेश, रौद्र अथवा क्रोध भाव ) — क्या! इतनी हिम्मत! खबरदार! चुप! मुँह संभाल के! ५. घृणा बोधक ( घृणा अथवा कुंठा भाव ) — छि:! छी-छी! थू! थू-थू! धत! हट! हुँह! ६. भय बोधक ( भय अथवा जुगुप्सा भाव ) — बाप रे! बाप रे बाप! त्राहि! त्राहि माम्! भागो! ७. आशीर्वाद बोधक ( मंगल अथवा कल्याण भाव ) — शुभम्! कल्याणम्! मंगलम्! आरोग्यम्! खुश रहो! प्रसन्न रहो! सुखी रहो! जीते रहो! चिरंजीवी रहो! ८. चेतावनी बोधक ( सुरक्षा भाव ) — होशियार! खबरदार! सावधान! बच के! जागते रहो! रुको! ९. प्रशंसा बोधक ( उत्साह भाव ) — शाबाश! बहुत अच्छे! बहुत सुंदर! अति सुंदर! अति उत्तम! वाह! क्या बात है! क्या खूब! बहुत खूब! १०. प्रार्थना बोधक ( शांति भाव ) — ओ३म्! हरिओ३म्! शिव-शिव! अलख निरंजन! शांति!-शांति!

समुच्चयबोधक अव्यय (व्याकरण से आंशिक)

‘समुच्चय’ का शाब्दिक अर्थ है — जोड़ा। समुच्चयबोधक अव्यय जोड़ा बनाने वाले शब्दों को कहते हैं। समुच्चयबोधक ‌‌‌‌‌‌‌‌भी सदा अपरिवर्तित रहते हैं। इन के स्वरूप पर‌ लिंग, वचन, कारक, काल, देश आदि के परिवर्तन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
परिभाषा — जो अव्यय पद दो शब्दों, दो उपवाक्यों ( वाक्यांशों, पदबंधों आदि) तथा दो वाक्यों को परस्पर ( आपस में ) जोड़ते हैं, उन्हें समुच्चयबोधक अव्यय कहते हैं। ( टिप्पणी — उपवाक्यों को वाक्यांश तथा पदबंध भी कहा जाता है। )
उदाहरण — १. और — मधु और सुनंदा पक्की सहेलियाँ हैं। ‌‌ २. तथा — संतरा तथा नारंगी एक ही फल के दो नाम हैं। ३. परंतु — ईश्वर एक है परंतु उसके नाम अनेक हैं। ‌‌४. अथवा — साकार अथवा निराकार परमेश्वर हम सब के भीतर वास करता है।

संबंधबोधक अव्यय (व्याकरण से आंशिक)

यह स्मरण रहना चाहिए कि प्रत्येक संबंधबोधक अव्यय से पूर्व उपयुक्त परसर्ग अवश्य लगाया जाए, अन्यथा संबंधबोधक में क्रिया विशेषण का भ्रम हो सकता है। दोनों के बीच दुविधा भी हो सकती है। जैसे — १. मंदिर के अंदर भगवान की मूर्ति है। (के अंदर– संबंधबोधक) । १. अंदर मंदिर में भगवान की मूर्ति है। (अंदर– क्रिया विशेषण) । २. बस्ती के बाहर मैदान में आओ। (के बाहर– संबंधबोधक) २. बाहर मैदान में आओ। (बाहर– क्रिया विशेषण) ।

क्रिया विशेषण (व्याकरण से आंशिक)

परिभाषा :- वे शब्द, जो क्रिया की विशेषता बताते हैं, उन्हें क्रिया विशेषण कहते हैं।
क्रिया विशेषण अविकारी पद हैं। वाक्य में लिंग, वचन, कारक, काल आदि किसी में भी परिवर्तन होने पर ये ज्यों के त्यों रहते हैं। इनमें कोई परिवर्तन नहीं होता।
क्रियाओं की विशेषता अनेक प्रकार से बताई‌ जा सकती है। अतः क्रिया विशेषण के भेद भी भिन्न-भिन्न होते हैं।

तारीफ़ तुम्हारी (कविता – साॅनेट )

दुआ यही हम करते हैं,
तारीफ़ तुम्हारा साया हो।
हर मौके-दर-मौके पर,
तारीफ़ ने तुमको पाया हो।।