Gyankatta

Online Examination, Speed and Efficiency

Hindi

क्रिया विशेषण (व्याकरण से आंशिक)

परिभाषा :- वे शब्द, जो क्रिया की विशेषता बताते हैं, उन्हें क्रिया विशेषण कहते हैं।
क्रिया विशेषण अविकारी पद हैं। वाक्य में लिंग, वचन, कारक, काल आदि किसी में भी परिवर्तन होने पर ये ज्यों के त्यों रहते हैं। इनमें कोई परिवर्तन नहीं होता।
क्रियाओं की विशेषता अनेक प्रकार से बताई‌ जा सकती है। अतः क्रिया विशेषण के भेद भी भिन्न-भिन्न होते हैं।

तारीफ़ तुम्हारी (कविता – साॅनेट )

दुआ यही हम करते हैं,
तारीफ़ तुम्हारा साया हो।
हर मौके-दर-मौके पर,
तारीफ़ ने तुमको पाया हो।।

व्याकरण से आंशिक ( क्रिया )

व्याकरण के नियमों के अनुसार वाक्य में जिन पदों ( शब्दों ) से कार्य के किए जाने अथवा होने का बोध हो, उन्हें क्रिया कहते हैं। वाक्य में क्रिया के साथ जुड़े अंग इस प्रकार हैं– कर्ता , कर्म।
कर्म :- वाक्य में होने वाला मुख्य कार्य, जो क्रिया को पूरा करता है, कर्म कहलाता है। कर्म केवल संज्ञा पद ही होता है। उदाहरण :- बच्चे पाठ पढ़ते हैं। वाक्य में ‘पाठ’ – पढ़ते हैं – क्रिया को पूरा करता है। अतः ‘पाठ’ कर्म है। इसी प्रकार – पक्षी दाना चुगते हैं। – दाना । मैंने दवाई खाई। – दवाई ।

विशेषण ( व्याकरण से आंशिक )

संज्ञा तथा ( अथवा ) सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्दों को ‘विशेषण’ कहते हैं। विशेषण जिस शब्द की विशेषता बताते हैं, उसे ‘विशेष्य’ कहते हैं। ( संज्ञा अथवा सर्वनाम ) ‌‌ उदाहरण — तपती गर्मी। ‌‌’तपती’ — विशेषण; ‌‌‌‌’गर्मी’ — विशेष्य ठंडा पानी। ‘ठंडा’ — विशेषण; ‘पानी’ — विशेष्य ‌‌

सर्वनाम ( व्याकरण से आंशिक )

सर्वनाम के भेद : सर्वनाम के भेद कुछ इस प्रकार गिनाए जाते हैं —
१. पुरुषवाचक सर्वनाम ( उत्तम पुरुषवाचक, मध्यम पुरुषवाचक, अन्य पुरुषवाचक ) २. निश्चयवाचक सर्वनाम ३. अनिश्चयवाचक सर्वनाम ४. संबंधवाचक सर्वनाम ५. निजवाचक सर्वनाम ६. प्रश्नवाचक सर्वनाम

एकाकी तृप्ति ( कहानी )

एक मास, दो मास…. ; मास-प्रति-मास व्यतीत होने लगे ; इस आशा में कि, अब सब ठीक हो जाएगा ; पर नहीं ; जन-साधारण का संक्रमित होना नहीं रुका, पर हाँ! इस बीच कोरोना संक्रमण को रोकने की दवा बनाने की प्रक्रिया अवश्य प्रारंभ हो गई। डाॅक्टरों तथा वैज्ञानिकों ने जी-जान लगा दी। धीरे-धीरे मामले भी कुछ कम होने लगे, तो सबके मन को ढाँढ़स बँधने लगा, कि अब संभवतः सब कुशल हो‌ जाए। चंचला तथा उसका परिवार सभी बचावों का पूरा ध्यान रखता था। अच्छी तरह मास्क लगा कर बाहर जाते। सभी वस्तुओं को कीटाणु नाशक छिड़काव से साफ़ करते। हाथों को धोते रहते या सैनेटाइज़र लगाते। वे सब बचे हुए थे तथा भगवान को धन्यवाद देते रहते थे। सब कुशलतापूर्वक चल रहा था। आठ-नौ माह बाद समाचार जगत में संभावनाएँ व्यक्त की जाने लगीं, कि कोरोना विषाणु की रोकथाम के लिए वैक्सीन आने वाली है। धीरे-धीरे संक्रमण का विस्तार भी सिमटता दिखाई देने लगा। जिस प्रकार कृष्ण जन्म से वर्षों पूर्व ही उनके अवतार लेने की भविष्यवाणी ने जनमानस को सुखी व हर्षित कर दिया था, उसी प्रकार वैक्सीन आने की संभावना मात्र से लोगों को मानो आरोग्य संजीवनी मिल गई।

संज्ञा ( व्याकरण से आंशिक )

तो इस प्रकार संज्ञा ‘नाम’ है; ‘पहचान’ है; ‘परिचय’ है । किसी भी व्यक्ति, वस्तु, प्राणी अथवा स्थान का प्रथम परिचय हमें उसके नाम से ही मिलता है। शेष परिचय बाद में होता है।

Watch “#हिंदी प्रार्थना# वह शक्ति हमें दो दया निधे कर्त्तव्य मार्ग पर डट जावें।” on YouTube

यह प्रार्थना मुझे अत्यंत प्रिय है। मेरे स्कूल में प्रतिदिन हुआ करती थी। …. श्री…. ( सहयोग कर्ता )____ ….. मनी ….. इस लिंक के साथ प्रस्तुत छवि हमें किसी प्रियजन द्वारा भेजी गई है।

समास (व्याकरण से आंशिक)

समास — का शाब्दिक अर्थ है — छोटा करना या संक्षिप्त करना। एक बड़े शब्द-समूह को संक्षिप्त करने की प्रक्रिया को समास कहते हैं। सामासित करके अर्थात् , संक्षिप्त करके बनाए ग‌ए एक शब्द को समस्त पद कहते हैं। जैसे — घोड़ों से चलने वाली गाड़ी — घोड़ागाड़ी। एक पद बनाने की इस प्रक्रिया को ‘समास’ के नाम से भी जाना जाता है।

विसर्ग संधि (व्याकरण से आंशिक)

विसर्ग का ‘ओ’ बन जाना — यदि विसर्ग ‘अ’ के साथ हो, तथा ‘+’ चिह्न के बाद किसी वर्ग का तीसरा या चौथा वर्ण‌ हो अथवा ‘य’ , ‘र’ ,‌‌‌‌‌‌ ‘ल’ , ‘व’ , ‘ह’ आदि में से कोई हो, तो न‌ए शब्द में विसर्ग के स्थान पर ‘ओ’ की मात्रा लग जाती है। जैसे — मन: + हर = मनोहर। वय: + वृद्ध = वयोवृद्ध। अध: + गति = अधोगति।

व्यंजन संधि (व्याकरण से आंशिक)

३. ‘त’ संबंधी नियम – क. यदि ‘+’ चिह्न के पहले ‘त् ‘ हो तथा बाद में ‘च्’ या ‘छ’ तो ‘त’ – ‘च’ बन जाएगा। सत् + चरित्र = सच्चरित्र। इसी प्रकार, ‘त’ के बाद ‘+’ चिह्न के बाद ‘ज’ या ‘झ’ हों तो ‘त’ का ‘ज’ बन जाएगा। ‘+’ चिह्न के बाद ‘ठ’ या ‘ड’ हों तो ‘त’ ‘ड्’ में बदल जाएगा। ‘+’ चिह्न के पश्चात ‘ल’ होने पर ‘त’ का ‘ल’ हो जाता है। सत् + जन = सज्जन। उत् + डयन = उड्डयन। उत् + लास = उल्लास।

रक्षक पर भक्षक को वारे : न्याय सिद्धि का दानी ( बुद्ध पूर्णिमा पर विशेष )

हंस को थोड़ी राहत मिली। उसने आँखें खोल दीं। उतनी देर में वहाँ देवदत्त आ पहुंचे। वे सिद्धार्थ के बड़े भाई थे ; स्वभाव से क्रोधी तथा आखेट के परम लोलुप। आते ही उन्होंने क्रोध में भर कर सिद्धार्थ को आदेश दिया, “यह हंस हमारा आखेट है। इस पर हमारा अधिकार है। इसे तुरंत हमें सौंप दो।” बड़े भ्राता का आदेश टालना परंपरा के विरुद्ध था ; फिर भी साहस कर सिद्धार्थ ने उनसे कहा, “यह आपका आखेट तब था, जब आपने इसे घायल किया था। परंतु इसके प्राणों की रक्षा करने के‌ बाद अब यह हमारा है। हम इसका उपचार करेंगे। स्वस्थ होने के बाद यह स्वतंत्र होगा।” परंतु देवदत्त नहीं माने। वे केवल क्रोधी ही नहीं, हठी भी थे। वे अपने आखेट को छोड़ने के लिए किसी भी दशा में प्रस्तुत न थे। दोनों भ्राताओं के मध्य विवाद बढ़ता गया। अंत में बड़े भाई ने न्यायालय से न्याय माँगने का निश्चय कर लिया।

स्वर संधि (व्याकरण से आंशिक)

४. वृद्धि संधि :- विपरीत स्वरों में से एक अथवा दोनों के दीर्घ रूप में मेल होने पर होने वाले परिवर्तन। जैसे — अ/आ + ए/ऐ = ऐ। एक + एक = एकैक। सदा + एव = सदैव। अ/ आ + ओ/औ = औ। परम + ओज = परमौज। महा + औदार्य = महौदार्य।

उपसर्ग व प्रत्यय (व्याकरण से आंशिक)

उपसर्ग व प्रत्यय दोनों के संबंध में एक और बिंदु महत्त्वपूर्ण है। वह यह कि शब्दांश व मूल शब्द दोनों एक ही समूह के हों; भिन्न-भिन्न नहीं। तत्सम् शब्दांश+तत्सम् मूल शब्द+तत्सम् शब्दांश। तद्भव शब्दांश+ तद्भव मूल शब्द+तद्भव शब्दांश। विदेशी भाषाएँ — समान भाषा शब्दांश तथा समान भाषा मूल शब्द।

सच का आइना (कहानी)

देखते ही देखते समय गुज़रा और मैं लड़कपन ( किशोरावस्था ) की दहलीज़ पर पहुँच ग‌ई। आइना भाने लगा। ममता की दूरी मार के स्थान पर तानों में बदलने लगी। माँ निरंतर मुझे नालायक, असफल, अयोग्य व साधारण होने का एहसास दिलाती रहतीं। मेरी तुलना मोहल्ले की दूसरी लड़कियों से करती रहतीं तथा उन्हें मुझसे अधिक योग्य व चतुर ठहरातीं। धीरे-धीरे उनकी टिप्पणियों ने मेरे हृदय में घर कर लिया।

अभिवादन ! ( संक्षिप्त निबंध )

वास्तव में अभिवादन अन्य के प्रति हमारे प्रेम तथा विनम्रता की अभिव्यक्ति होती है। अभिवादन करते ही दोनों पक्षों के मन के कलुष कुछ सीमा तक कम हो जाते हैं। धैर्य पूर्वक किया गया अभिवादन अन्य के हृदय में हमारे प्रति यथायोग्य प्रेम व आदर-सम्मान को बढ़ा देता है।

पानी-पानी रे (कविता)

पानी-पानी रे….. !
पानी-पानी रे……..!
बारिश में पानी भर जाए,
गड्ढे उछलें ऐसे.., ‌
घर में कीचड़-कीचड़ आए,
मम्मी पोंछे; हम पर बरसे!
छाता लो; बरसाती ओढ़ो;
तब तो बाहर जाओ!
बिन माँगे सरदी-ज़ुकाम,
उपहार मुफ़्त में पाओ।

तत्सम् एवं तद्भव (व्याकरण से आंशिक)

अब ऐसे ही जब तद्भव शब्द बनते हैं, तो उनका रूप बिगड़ता है – कभी थोड़ा तो कभी अधिक। *अग्नि* से *आग* बनते हुए; *दुग्ध* से *दूध* बनते हुए थोड़ा परिवर्तन होता है, परंतु *धर्म* से *धाम* ; *कर्म* से *काम*; *भ्राता* से *भाई* आदि बनने में अधिक परिवर्तन हो जाता है। परंतु किसी भी दशा में तद्भव की रूप-रचना तत्सम् से एकदम भिन्न नहीं हो सकती। उदाहरणार्थ – *जल* का तद्भव *पानी* ; *पवन* का तद्भव *हवा* ; *अश्व* का तद्भव *घोड़ा* तो कभी नहीं हो सकता।