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पानी-पानी रे (कविता)

पानी-पानी रे (कविता)





प्रिय पाठको!

एक दिन हमारे पास एक हास्य कविता प्रतियोगिता आई। उसमें आठवीं तक के किसी बच्चे को कविता बुलवानी थी। प्रतियोगिता का नाम था — “निर्झर”। शीर्षक पानी से जुड़ा था– झरना। उसी समय परिवार का कोई सदस्य फ़िल्म ‘माचिस’ का गीत गुनगुना रहा था — पानी-पानी रे! बस! मन में विचार उठा कि पानी पर ही कोई कविता तैयार की जाए। तो इसी पंक्ति से हमने एक कविता लिखी, जिसे यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।

पानी-पानी रे…… पानी-पानी रे…….

आई गरमी, उठी बालटी,
लगे हैं पानी भरने।
मोटर चले तो पानी आए,
तिस पर बिजली के धरने।
एक हज़ार लीटर की टंकी, हमने है लगवाई !
जिससे घर में पानी
कभी-भी कम न होवे भाई।
पर हाय! जिसको देखो,
उसने ‌चार बार नहाया!
उस हज़ार लीटर की टंकी ने
भी मातम मनाया।

पानी-पानी रे….. !
पानी-पानी रे……..!
बारिश में पानी भर जाए,
गड्ढे उछलें ऐसे.., ‌
घर में कीचड़-कीचड़ आए,
मम्मी पोंछे; हम पर बरसे!
छाता लो; बरसाती ओढ़ो;
तब तो बाहर जाओ!
बिन माँगे सरदी-ज़ुकाम,
उपहार मुफ़्त में पाओ।

पानी-पानी रे…..!
पानी-पानी रे…..!
आया जाड़ा, हाड़ कँपाए,
अब‌ तो पानी ज़रा न भाए!
गर्म पानी के बिना तो भ‌इया,
स्नान भी हो न पाए!
टंकी ने भी जोड़े हाथ,
कि कुछ तो पानी ले लो!
दिखलाया हमने भी ठेंगा,
कि अब तो तुम ‌न बोलो!

गजब है पानी तेरी माया,
हर मौसम तूने नाच नचाया।
और हम भी नाचे जाएँ…
सारी बातें भूल क्योंकि ?
अरे क्योंकि!
रहिमन पानी राखिए,
बिन पानी सब सून।।

धन्यवाद!

….. श्री …..

इस अंक में ली गई छवि को हमने ‘पिक्साबे’ साइट से साभार उद्धरित किया है।

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