“श्री!” स्वागतम् संदेश!
कुछ वर्ष पूर्व तक ऐसा प्रतीत होता था कि यह स्थिति केवल हिंदी की है। धीरे-धीरे अनुभव होने लगा कि सभी भारतीय भाषाओं तथा बोलियों की यही दशा होती जा रही है। आज इक्कीसवीं शताब्दी का तीसरा दशक आरंभ हो चुका है। आज की दशा को अनुभव करते हुए अंतरराष्ट्रीय भाषा बन चुकी ‘अंग्रेज़ी’ भी इसी दयनीय स्थिति में पहुँच चुकी है।