भोपाल_गैस_काण्ड

◆भारत के मध्य प्रदेश राज्य के भोपाल शहर मे 3 दिसम्बर सन् 1984 को एक भयानक औद्योगिक दुर्घटना हुई। इसे भोपाल गैस कांड, या भोपाल गैस त्रासदी के नाम से जाना जाता है।

◆भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड नामक कंपनी के कारखाने से एक ज़हरीली गैस का रिसाव हुआ जिससे लगभग 15000 से अधिक लोगो की जान गई तथा बहुत सारे लोग अनेक तरह की शारीरिक अपंगता से लेकर अंधेपन के भी शिकार हुए।

◆ भोपाल गैस काण्ड में #मिथाइलआइसोसाइनाइट (मिक) नामक जहरीली गैस का रिसाव हुआ था। जिसका उपयोग कीटनाशक बनाने के लिए किया जाता था। मरने वालों के अनुमान पर विभिन्न स्त्रोतों की अपनी-अपनी राय होने से इसमें भिन्नता मिलती है। फिर भी पहले अधिकारिक तौर पर मरने वालों की संख्या 2,259 थी।

◆2006 में सरकार द्वारा दाखिल एक शपथ पत्र में माना गया था कि रिसाव से करीब 558,125 सीधे तौर पर प्रभावित हुए और आंशिक तौर पर प्रभावित होने की संख्या लगभग 38,478 थी।

◆भोपाल गैस त्रासदी को लगातार मानवीय समुदाय और उसके पर्यावास को सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाली औद्योगिक दुर्घटनाओं में गिना जाता रहा। इसीलिए 1993 में भोपाल की इस त्रासदी पर बनाए गये भोपाल-अंतर्राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को इस त्रासदी के पर्यावरण और मानव समुदाय पर होने वाले दीर्घकालिक प्रभावों को जानने का काम सौंपा गया।

#कारकों_का_योगदान-

नवम्बर 1984 तक कारखाना के कई सुरक्षा उपकरण न तो ठीक हालात में थे और न ही सुरक्षा के अन्य मानकों का पालन किया गया था। स्थानीय समाचार पत्रों के पत्रकारों की रिपोर्टों के अनुसार कारखाने में सुरक्षा के लिए रखे गये सारे मैनुअल अंग्रेज़ी में थे। जबकि कारखाने में कार्य करने वाले ज़्यादातर कर्मचारी को अंग्रेज़ी का बिलकुल ज्ञान नहीं था। साथ ही, पाइप की सफाई करने वाले हवा के वेन्ट ने भी काम करना बन्द कर दिया था। समस्या यह थी कि टैंक संख्या 610 में नियमित रूप से ज़्यादा एमआईसी गैस भरी थी तथा गैस का तापमान भी निर्धारित 4.5 डिग्री की जगह 20 डिग्री था। मिक को कूलिंग स्तर पर रखने के लिए बनाया गया फ्रीजिंग प्लांट भी पॉवर का बिल कम करने के लिए बंद कर दिया गया था।

पूर्व घटना चरण-

सन 1969 मे यू.सी.आइ.एल.कारखाने का निर्माण हुआ जहाँ पर मिथाइलआइसोसाइनाइट नामक पदार्थ से कीटनाशक बनाने की प्रक्रिया आरम्भ हुई। सन 1979 मे मिथाइल आइसोसाइनाइट के उत्पादन के लिये नया कारखाना खोला गया।

गैस का निस्तार-

2-3 दिसम्बर की रात्रि को टैन्क इ-610 मे पानी का रिसाव हो जाने के कारण अत्यन्त ग्रीश्म व दबाव पैदा हो गया और टैन्क का अन्तरूनी तापमान 200 डिग्री के पार पहुच गया जिसके ततपश्चात इस विषैली गैस का रिसाव वातावरण मे हो गया। 45-60 मिनट के अन्तराल लगभग 30 मेट्रिक टन गैस का रिसाव हो गया।

निस्तार वाद-

इस त्रासदी के उपरान्त भारतीय सरकार ने इस कारखाने में लोगों के घुसने पर रोक दी, अत: आज भी इस दुर्घटना का कोई पुष्ट् कारण एवम तथ्य लोगो के सामने नही आ पाया है। शुरुआती दौर मे सी बी आइ तथा सी एस आइ आर द्वारा इस दुर्घट्ना की छान-बीन करी गयी।

दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभाव-

भोपाल की लगभग 5 लाख 20 हज़ार लोगो की जनता इस विषैली गैस से सीधी रूप से प्रभावित हुइ। जिसमे 2,00,000 लोग 15 वर्ष की आयु से कम थे।2249 लोगो की इस गैस की चपेट मे आ कर आकस्मक ही मृतयु हो गयी।

स्वास्थ्य देखभाल-

रिसाव के तुरन्त बाद चिकित्सा संस्थानों पर अत्यधिक दबाव पड़ा। कुछ सप्ताह के भीतर ही राज्य सरकार ने गैस पीडितो के लिये कई अस्पताल एव चिकित्सा खाने खोले, साथ ही कई नये निजी सन्स्थान भी खोले गये। सर्वाधिक प्रभावित इलाकों में 70 प्रतिशत से ज़्यादा कम पढ़े लिखे चिकित्सक थे, वे इस रासायनिक आपदा के उपचार के लिये सम्पूर्ण रूप से तैयार नहीं थे। 1988 मे चालू हुए भोपाल मेमोरिअल अस्पताल एव रिसर्च सेन्टर ने 8 वर्षो के लिये ज़िन्दा पीड़ितो को मुफ्त उपचार उपलब्ध कराया।

सक्रियता-

वर्ष 1984 के बाद से ही व्यक्तिगत सक्रियतावादियों ने अहम भूमिका निभायी है, जिनमें से महत्वापूर्ण योगदान रहा श्री सतिनाथ सारङी का जिन्होने पीडितों कि राहत के लिये सम्भावना ट्रस्ट नामक संस्था भी तैयार की।
【 # NOTE – भोपाल गैस कांड से संबंधित प्रश्न Mppsc-2016 मुख्य परीक्षा में भी 6 अंको मे पूछा गया व विगत वर्ष में हुई प्रारंभिक परीक्षा में भी इससे प्रश्न पुछा गया है। जैसे- गैस कांड की दिनांक।】